पटना/दरभंगा: बिहार चुनाव 2025 में कई बड़े चेहरे थे, लेकिन जिस नाम ने पूरे देश का ध्यान खींच लिया, वो था मशहूर लोकगायिका मैथिली ठाकुर।
सिर्फ 25 साल की उम्र में अलीनगर सीट से बीजेपी की उम्मीदवार बनकर उन्होंने जीत हासिल की और एक ही झटके में बिहार की सबसे कम उम्र की विधायक बन गईं।
उनकी जीत भले ही आज की बात लगे, लेकिन इसके पीछे की कहानी काफी लंबी है—गायकी से मिली पहचान, स्ट्रगल, पड़ोसियों की शिकायतें, और 10 साल में 17 बार घर बदलने का दर्द… यह सब सुनकर लगता है जैसे किसी फिल्म की स्टोरी हो।
बचपन से ही घर में था संगीत का माहौल
मैथिली बिहार के मधुबनी जिले में पैदा हुईं। उनके घर में बचपन से सुर और ताल की गूंज रहती थी।
पिता रमेश ठाकुर खुद संगीत सिखाते थे और अपने तीनों बच्चों—मैथिली, ऋषभ और अयाची—को रोज रियाज़ करवाते थे।
धीरे-धीरे मैथिली की आवाज़ सोशल मीडिया और YouTube पर हर तरफ छाने लगी।
उनकी लोकगीत वाली सादगी और मीठा सुर लोगों को इतना भाया कि वो पूरे देश में छा गईं।
फेम मिला, लेकिन परेशानियाँ भी बढ़ीं
जैसे-जैसे मैथिली की लोकप्रियता बढ़ी, घर के बाहर रोज भीड़ जुटने लगी।
लोग मिलने आते, फोटो लेते, वीडियो बनाते… और ये सब देखकर पड़ोसियों को दिक्कत होने लगी।
शिकायतें बढ़ीं तो हालात ऐसे बने कि परिवार को बार-बार घर बदलना पड़ा।
10 साल में 17 घर बदलना कोई छोटा काम नहीं होता।
हर नई जगह, नए लोग, नई शुरुआत… लेकिन परिवार ने हिम्मत नहीं हारी।
सोशल मीडिया स्टार से राजनीति तक का सफर
मैथिली की पहचान सिर्फ एक गायिका भर नहीं थी। वो समाज, लोक कला और युवाओं से जुड़े मुद्दों पर खुलकर बोलती थीं।
उनकी साफ-सुथरी छवि और सादगी ने लोगों को उनसे जोड़ दिया।
यही कारण रहा कि बीजेपी ने उन्हें अलीनगर से टिकट दिया।
कई लोग हैरान थे—
क्या इतनी कम उम्र में राजनीति चल पाएगी?
क्या लोग एक गायिका को नेता मानेंगे?
लेकिन चुनावी माहौल ने सब सवालों का जवाब दे दिया।
पहली ही बार में जबरदस्त जीत
अलीनगर के लोगों ने उन्हें खुलकर समर्थन दिया।
उनकी सहज भाषा, सोशल मीडिया पर मजबूत कनेक्ट और साफ छवि ने मतदाताओं को प्रभावित किया।
नतीजा आया तो वे भारी अंतर से जीतकर विधायक बन गईं।
लोग खुशी से कहते दिखे—
“मैडम सिर्फ गाती नहीं, दिल भी जीत लेती हैं।”
संघर्ष ही मेरी ताकत है: मैथिली ठाकुर
जीत के बाद उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा—
“पड़ोसियों की शिकायतें, भीड़, घर बदलना… ये सब मुश्किल था।
लेकिन लोगों का प्यार ही मुझे आज यहां तक लाया है।”
सूत्रों के मुताबिक, अब वे अपने क्षेत्र में शिक्षा, युवा रोजगार, लोककला, और ग्रामीण विकास पर काम शुरू करने की तैयारी में हैं।
लोगों को क्यों पसंद आईं मैथिली?
क्योंकि वो बाकी नेताओं से बिल्कुल अलग हैं।
उनमें जमीन से जुड़ाव है, सिंपल भाषा है, और सोशल मीडिया पर वो बिना दिखावे के बात करती हैं।
कला से जुड़ाव, विवादों से दूरी और युवाओं पर असर—ये सब मिलकर उन्हें खास बनाता है।
एक कलाकार से नेता—नई शुरुआत
कुछ साल पहले तक मैथिली पूरे मन से सुरों की साधना कर रही थीं।
आज वे एक सार्वजनिक जिम्मेदारी निभा रही हैं।
उनका सफर साफ बताता है कि मेहनत और ईमानदारी से इंसान कितना आगे जा सकता है।
अलीनगर की जनता ने उन्हें अवसर दिया है, और अब देखना होगा कि वे आने वाले समय में इस भरोसे को कैसे निभाती हैं।
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वाह! मैथिली ठाकुर की कहानी सुनकर दिल खुश हो गया। इतनी कम उम्र में इतना कुछ हासिल करना, कमाल है। स्ट्रगल से निकलकर विधायक बनना, प्रेरणादायक है यार!
वाह! मैथिली ठाकुर की कहानी तो एकदम फिल्मी है। इतनी कम उम्र में विधायक बनना, और वो भी इतने स्ट्रगल के बाद! दिल जीत लिया उन्होंने। बिहार के लिए अच्छा होगा।