Written by: Prashant Pathak
Edited by: Ram Pandey
Published on: 27 January 2026
भारत में उच्च शिक्षा को नियंत्रित और बेहतर बनाने के लिए University Grants Commission (UGC) की स्थापना 1956 के UGC Act के तहत की गई थी। इसका मकसद देश के विश्वविद्यालयों में शिक्षा की गुणवत्ता बनाए रखना, फंडिंग देना और शैक्षणिक मानक तय करना है।
लेकिन हाल ही में UGC द्वारा जारी 2024–2025 के नए Draft Regulations ने एक बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है। छात्र संगठनों, शिक्षकों, राज्य सरकारों और सामाजिक वर्गों — खासकर स्वर्ण समाज और सामान्य वर्ग — में इस नए नियम को लेकर चिंता और विरोध तेज़ हो गया है।
UGC Act क्या है और इसका असली उद्देश्य क्या है?
UGC Act का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि भारत में उच्च शिक्षा मानकपूर्ण, पारदर्शी और गुणवत्तापूर्ण रहे। UGC का काम विश्वविद्यालयों को मान्यता देना, फंडिंग उपलब्ध कराना और यह देखना है कि शैक्षणिक संस्थान तय मानकों का पालन कर रहे हैं या नहीं।
सीधे शब्दों में कहें तो UGC भारत की उच्च शिक्षा का नियामक (Regulator) है।
नया UGC कानून क्या बदलाव ला रहा है?
UGC के नए ड्राफ्ट नियम कई अहम बदलाव प्रस्तावित करते हैं, जिनसे विश्वविद्यालयों की कार्यप्रणाली प्रभावित हो सकती है।
इन प्रमुख बदलावों में शामिल हैं:
1. Vice-Chancellor (VC) की नियुक्ति प्रक्रिया में बदलाव
अब VC की नियुक्ति में राज्य सरकारों की भूमिका कम और केंद्र सरकार व राज्यपाल की भूमिका अधिक हो सकती है।
राज्यों को डर है कि इससे उनकी शैक्षणिक स्वायत्तता कमजोर होगी।
2. फैकल्टी भर्ती और प्रमोशन नियमों में बदलाव
नए नियमों से शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया, प्रमोशन और मूल्यांकन प्रणाली प्रभावित हो सकती है, जिससे शिक्षकों पर काम का दबाव बढ़ने की आशंका है।
3. शिक्षा में अधिक केंद्रीकरण
आलोचकों का कहना है कि यह कानून शिक्षा को केंद्र सरकार के अधिक नियंत्रण में ला सकता है, जिससे राज्यों की स्वतंत्रता घट सकती है।
4. आरक्षण और सामाजिक संतुलन को लेकर चिंता
नए नियमों में आरक्षण और सामाजिक प्रतिनिधित्व को लेकर स्पष्टता नहीं होने से कई वर्गों में डर है कि इससे सामाजिक संतुलन प्रभावित हो सकता है।
5. निजी और कॉरपोरेट भागीदारी का डर
कुछ नियमों से यह संकेत मिलता है कि निजी और कॉरपोरेट सेक्टर की भागीदारी बढ़ सकती है, जिससे शिक्षा के व्यावसायीकरण की आशंका है।
छात्र संगठन और शिक्षक क्यों कर रहे हैं विरोध?
देशभर में AISF, अन्य छात्र संगठन और शिक्षक संघों ने इन नियमों के खिलाफ प्रदर्शन किया है।
उनकी मुख्य चिंताएँ हैं:
विश्वविद्यालयों की स्वतंत्रता खतरे में पड़ सकती है
छात्रों और शिक्षकों की नीति-निर्माण में भागीदारी कम हो सकती है
शिक्षा पर राजनीतिक और कॉरपोरेट दबाव बढ़ सकता है
नियमों को बिना पर्याप्त परामर्श और सार्वजनिक चर्चा के लागू किया जा रहा है
छात्र संगठनों का कहना है कि शिक्षा प्रणाली लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित होनी चाहिए, न कि राजनीतिक नियंत्रण पर।
स्वर्ण समाज और सामान्य वर्ग क्यों नाराज़ हैं?
हाल के दिनों में स्वर्ण समाज और General Category के छात्रों के बीच भी असंतोष देखा जा रहा है।
उनकी चिंताएँ हैं:
नए नियमों का गलत इस्तेमाल किया जा सकता है
अनुशासनात्मक मामलों और शिकायत प्रक्रिया में पक्षपात की आशंका
कैंपस में झूठे आरोप और गलत कार्रवाई का डर
नियमों की भाषा स्पष्ट नहीं, जिससे गलत व्याख्या संभव
कई लोगों का मानना है कि नियम संतुलित और पारदर्शी नहीं हैं, जिससे भेदभाव की संभावना बढ़ सकती है।
राज्य सरकारें और शिक्षा विशेषज्ञ क्या कह रहे हैं?
कई राज्य सरकारों का कहना है कि यह कानून संघीय ढांचे (Federal Structure) के खिलाफ जा सकता है।
उनका तर्क है कि:
शिक्षा राज्यों का विषय है
केंद्र सरकार का अधिक हस्तक्षेप संवैधानिक संतुलन को कमजोर कर सकता है
राज्यों की शैक्षणिक स्वायत्तता घट सकती है
शिक्षा विशेषज्ञों का भी मानना है कि सुधार जरूरी हैं, लेकिन बिना पर्याप्त चर्चा के नियम लागू करना खतरनाक हो सकता है।
सरकार और शिक्षा मंत्री का पक्ष
केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने स्पष्ट किया है कि सरकार का उद्देश्य किसी वर्ग के साथ अन्याय करना नहीं है।
सरकार का कहना है कि:
नए नियमों का दुरुपयोग नहीं होने दिया जाएगा
ये सुधार गुणवत्ता, पारदर्शिता और मेरिट सिस्टम मजबूत करने के लिए हैं
लक्ष्य है कि भारत की शिक्षा प्रणाली को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाया जाए
सरकार का दावा है कि यह कदम शिक्षा के भविष्य को बेहतर बनाने के लिए है।
निष्कर्ष: सुधार की कोशिश या नया विवाद?
नया UGC ड्राफ्ट कानून शिक्षा सुधार के इरादे से लाया गया है, लेकिन इसके कुछ प्रावधानों को लेकर छात्रों, राज्यों और सामाजिक वर्गों में गंभीर चिंता बनी हुई है।
यह विवाद सिर्फ शिक्षा से जुड़ा नहीं है —
यह संवैधानिक अधिकार, सामाजिक न्याय, राज्य स्वायत्तता और निष्पक्षता से भी जुड़ा हुआ है।
अब देखना यह होगा कि सरकार इन नियमों में संशोधन करती है या यह मुद्दा आने वाले समय में और बड़ा राजनीतिक और सामाजिक विवाद बनता है।